बात कहूँ या रहने दूं, बात है सिर्फ़ एक छोटी सी, मामूली सी कला है यह तो, श्वास-मनन कर जीने की.
एक वही छोटी सी साँस, जहाँ होता विखंडन कठिनाइयों का. सो जाती संपूर्ण सृष्टि जहाँ, घुल जाता पूरा संसार वहाँ.
उसी श्वेत साँस को बाँध मुट्ठी में, रुख़ अपना पकड़ना ओ राही, हो जाए कठिन कभी जो चलना, कुछ देर रुक भी जाना तू साथी.
महकना प्रकृति है फूलों की, तू भी थोड़ा खुश बिखेरना, जो हो कभी थकावट मन में अगर, एक बाग नये में तू घर लेना.
फिर कभी जो साहस काँपे, और श्वास रंग हो जाए गहरा, कर ध्यान उन्हीं फूलों की खुश्बू, शुद्ध सफेद वर्ण खुद में भरना.
उस एक अनंत लघु साँस में, जहाँ बसता अद्वैत ज्ञान है, एक पल को ठहर के थोड़ा, मानस परिवर्तन कर लेना.
जब हो थकावट तेरे मन में, एक बाग नये में तू घर लेना.